प्रकाशन

प्रिय स्वजन बन्धुओं,

              आपको जानकर हर्ष होगा कि पांचाल/लोहाकार समाज इस वर्ष से अपनी वार्षिक पत्रिका का प्रकाशन करने जा रहा है जिसका उद्देश्य समाज में आपसी सम्बन्धों एवं सम्पर्क को बढावा देना है। पत्रिका में प्रकाशन सामग्री हेतु आप समाज का इतिहास व समाचार, स्वरचित/संकलित कहानी, कविता, हास्य एवं व्यंग्य रचनाऐं, गृहणी कौशल कलाऐं/पाक कला/महेंदी, सवेदनाऐं, प्रेरक सूत्र एवं घटनाऐं, नियुक्ति व निर्वाचन पर बधाईयां एवं समाज से सम्बन्धित समस्त जानकारी हमारे Whatsapp No.  75-99-411-822/E mail: ahuti.co.in@gmail.com  पर अपने पूर्ण विवरण सहित प्रेषित करें। पत्रिका की प्रति प्राप्त करने हेतु स्वंय तथा परिचित समस्त स्वजातिय बन्धुओं के नाम पूर्ण पते व मोबाइल नं0  सहित 75-99-411-822 पर मैसेज/वॉटस्‍प करें या हमारी वेबसाइट www.ahuti.co.in पर रजिस्टर करें।

पत्रिका

ख्वाहिश नहीं मुझे, मशहूर होने की,
आप मुझे पहचानते हो, बस इतना ही काफी है.
अच्छे ने अच्छा और, बुरे ने बुरा जाना मुझे
क्यों की जिसकी जितनी जरूरत थी
उसने उतना ही पहचाना मुझे.

जिन्दगी का फलसफा भी,कितना अजीब है,
शामें कटती नहीं और,साल गुजरते चले जा रहें है
एक अजीब सी, दौड है ये जिन्दगी
जीत जाओ तो कई, अपने पीछे छूट जाते हैं और
हार जाओ तो, अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं.

बैठ जाता हूँ, मिट्टी पे अकसर
क्योंकी मुझे अपनी, औकात अच्छी लगती है.
मैंने समंदर से, सीखा है जीने का सलीका,
चुपचाप से बहना और, अपनी मौज मे रहना.

ऐसा नहीं की मुझमें, कोई ऐब नहीं है,
पर सच कहता हूँ, मुझमें कोई फरेब नहीं है._
जल जाते है मेरे अंदाज से, मेरे दुश्मन,
क्यों की एक मुद्दत से मैंने न मोहब्बत
बदली और न दोस्त बदले हैं.

एक घडी खरीदकर, हाथ मे क्या बांध ली
वक्त पीछे ही, पड गया मेरे.
सोचा था घर बना कर, बैठुंगा सुकून से,
पर घर की जरूरतों ने, मुसाफिर बना डाला मुझे.

सुकून की बात मत कर, ऐ गालिब,
बचपन वाला इतवार, अब नहीं आता.
जीवन की भाग दौड मे, क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?
हँसती-खेलती जिन्दगी भी, आम हो जाती है.

एक सवेरा था, जब हँसकर उठते थे हम,
और आज कई बार बिना मुस्कुराये, ही शाम हो जाती है.
कितने दूर निकल गए, रिश्तों को निभाते निभाते
खुद को खो दिया हम ने, अपनों को पाते पाते.

लोग केहते है, हम मुस्कुराते बहुत है,
और हम थक गए, दर्द छुपाते छुपाते.
खुश हूँ और सबको, खुश रखता हूँ,
लापरवाह हूँ फिर भी, सब की परवाह करता हूँ.

मालूम है, कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी
कुछ अनमोल लोगों से, रिश्ता रखता हूँ.

By : Ritu Panchal Palwal

सुबह सुबह वॉटस्प खोलो तो, यूँ लगता है हरिद्वार आ गए हैं
इतना ज्ञान बरसता है कि, मन एकदम शुद्ध हो जाता है
वॉटस्प के सभी ऋषि मुनियों को
मेरा प्रणाम…आपका
चमन विश्वकर्मा

Attitude तो मेरे पास भी है, लेकिन इतना फोकट का भी नहीं हैं,
जो बात-बात पे Attitude दिखाऊ.—:आदित्य विश्वकर्मा
I loved a GIRL & nd she broke my heart …..Now every piece of my heart love different girls …. people called it flirt that’s not fair ….. -: Naveen Panchal Delhi