प्रकाशन

प्रिय स्वजन बन्धुओं,

              आपको जानकर हर्ष होगा कि पांचाल/लोहाकार समाज इस वर्ष से अपनी वार्षिक पत्रिका का प्रकाशन करने जा रहा है जिसका उद्देश्य समाज में आपसी सम्बन्धों एवं सम्पर्क को बढावा देना है। पत्रिका में प्रकाशन सामग्री हेतु आप समाज का इतिहास व समाचार, स्वरचित/संकलित कहानी, कविता, हास्य एवं व्यंग्य रचनाऐं, गृहणी कौशल कलाऐं/पाक कला/महेंदी, सवेदनाऐं, प्रेरक सूत्र एवं घटनाऐं, नियुक्ति व निर्वाचन पर बधाईयां एवं समाज से सम्बन्धित समस्त जानकारी हमारे Whatsapp No.  75-99-411-822/E mail: ahuti.co.in@gmail.com  पर अपने पूर्ण विवरण सहित प्रेषित करें। पत्रिका की प्रति प्राप्त करने हेतु स्वंय तथा परिचित समस्त स्वजातिय बन्धुओं के नाम पूर्ण पते व मोबाइल नं0  सहित 75-99-411-822 पर मैसेज/वॉटस्‍प करें या हमारी वेबसाइट www.ahuti.co.in पर रजिस्टर करें।



पत्रिका प्रकाशन सामग्री 

 (यह पत्रिका नहीं है केवल प्रकाशन हेतु सामग्री मात्र है)

संकलन —: इतिहास के झरोखे से

कश्मीर में लोहारों (विश्वकर्मा वंशज) का गौरवमयी इतिहास/अंतिम हिन्दू शासन

प्राप्त साक्ष्यों तथा कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी इतिहासकारों के लिए एक ऐसी ऐतिहासिक पुस्तक साबित हुई जिसके अनुसार यह ज्ञात हो सका की लोहारों (विश्वकर्मा वंशीय)का वंश भी शासन प्रभुता में आगे रहा है यह हिन्दू शासन कश्मीर राज्य मे सन 1003 से 1159 तक लगभग 150 सालों तक चला जो अंतिम हिन्दू शासन कहलाया।
लोहार वंश जिसके संस्थापक रानी दिदृदा के भाई संग्रामराज थे संग्रामराज बड़े न्याय प्रिय उदारवादी राजा थे उनके साशन काल में प्रजा सुख-चैन से दिन व्ययतीत कर रही थी किसी भी प्रकार का अभाव व् विकार लोगों में नहीं था।उनके बाद राज सिंहासन अनंतराज को मिला जिन्होंने अपनी वीरता धीरता शौर्यता के बल पर अपने शासन काल में सामन्तों के विद्रोह को छिन्न-भिन्न कर के धराशायी कर दिया तथा अपने सासन क्षेत्र का विस्तार भी किया सासन सत्ता सुचारू रूप से कायम करने में लगभग सफल रहे ।अनंतराज की धर्मपत्नी रानी सूर्यमति में कुशल रानी के गुण विद्यमान तो थे ही साथ साथ कुशल राजनीतिज्ञ व् नेतृत्वकर्ता के गुण भी कूट कूट कर भरे थे। अनंतराज के शासन में उनकी धर्मपत्नी रानी सूर्यमती पूर्ण रूप से हस्तक्षेत व् सहयोग किया करती थी सभी अहम् मुद्दों पर बराबर विचार विमर्श करती थी तथा उनके द्वारा प्रतिपादित नियम व् कानून अकाट्य सिद्ध होते थे स्वयं राजा अनंतराज व् उनका मंत्रिमंडल भी रानी सूर्यमति द्वारा बनाये नियम कानून में कभी कोई कमी नहीं निकाल पाता था ज्यो का त्यों लागू कर दिया जाता था। अनन्तराज के पुत्र कलश थे जिन्होंने कुछ विशेष कार्य नहीं किये कुशल राजा व् नेतृत्व न होने के कारण शासन सत्ता कमजोर क्षीण होती गई जिससे अनंत राज द्वारा विस्तारित क्षेत्र व् राज्य कमजोर होता गया ।
राजा कलश के पुत्र हर्षदेव महाविद्वान,प्रखर बुद्धि,दार्शनिक,कवि थे तथा उनमे कुशल राजा के गुण विद्यमान थे उनको कई विभिन्न भाषाओं एवं विद्याओं का भी ज्ञान था। हर्षदेव धीरे धीरे सासन सत्ता में इतने मुग्ध हो गए उन्हें प्रजा के दुःख सुख से मोह ख़त्म होता गया राज्य में अशांति व्याप्त हो गई भयानक अकाल पड़ गया किसानों साहूकारों से अत्यधिक कर वसूला जाने लगा कर या लगान न देने पर राजा के सैनिको द्वारा कई अलग अलग तरह से दंड का प्रावधान किया जाने लगा जिससे प्रजा आतंकित हो गई।राजा हर्षदेव के अत्याचारपूर्ण कार्यो से त्रस्त होकर उत्सल एवं सुस्सल नामक भाईयों ने राजा हर्ष देव के खिलाफ विद्रोह कर दिया अशान्ति,भुखमरी,दमन,अत्याचार के कारण शुरू हुए विद्रोह में लगभग 1101 ई. में राजा हर्षदेव तथा उनके पुत्र भोज की हत्या कर दी गयी।
हर्षदेव को कश्मीर के ‘नीरो’ की संज्ञा भी दी गयी है।(नीरो –> रोम का अत्याचारी सासक था पुरे राज्य में आग लगी थी खुद खड़ा होकर सारंगी बजा रहा था कहा जाता है आग खुद नीरो ने लगवाई थी)
राजतरंगिणी के लेखक कल्हण राजा हर्षदेव के आश्रित कवि थे और राजतरंगिणी एक निष्पक्ष और निर्भय ऐतिहासिक कृति है। स्वयं कल्हण ने राजतरंगिणी में कहा है कि एक सच्चे इतिहास लेखक की वाणी को न्यायाधीश के समान राग-द्वेष-विनिर्मुक्त होना चाहिए, तभी उसकी प्रशंसा हो सकती है

श्लाध्य: स एव गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता।
भूतार्थकथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती॥ (राजतरंगिणी, १/७)

इस लिए यह माना जा सकता है कि कल्हण द्वारा रागतरंगिनी में तत्कालीन राजाओं का जो भी वर्णन मिलता है वह किंचित मात्र भी विचलित करने वाला नहीं है।
कल्हण जाति से ब्राह्मण था उसके पिता का नाम चम्पक था। चम्पक लोहार वंशीय राजा हर्ष के मन्त्री थे तथा कल्हण हर्ष का आश्रित कवि था। कल्याण मे राजातरिणी ग्रंथ की जब रचना की उस समय लोहार वंशीय राजा जयंसिह का शासन काल कश्मीर मे चल रहा था।
लोहार वंश का अन्तिम शासक राजा जयसिंह (1128-1155 ई.) थे।उन्होंने अपने युद्ध कला कौशल से यूनानी मूल के यवनों को परास्त किया था तथा राज्य की सीमा विस्तार शुरू कर दिया। जयसिंह कश्मीर में हिन्दू वंश तथा लोहार वंश के अंतिम शासक के रूप में जाने जाते हैं जय सिंह राजतरंगिणी के आखिरी सासक हैं।इसके बाद तुर्क शासकों का इतिहास प्राप्त होता है
कश्मीर में अंतिम हिन्दू लोहार वंश के लगातार आठ राजाऒ का वर्णन मिलता है जिनके नाम निम्नवत हैं
1-संग्रामराज
2-अनन्तदेव
3-कलशदेव
4-हर्षदेव
5-उच्छ्ल
6-सुस्सल
7-शिक्षाचर
8-जयसिंह आदि थे
इन हिन्दू लोहार वंशीय (विश्वकर्मा वंशीय)राजाओं ने मिलकर लगभग157 वर्ष तक जम्मू- कश्मीर मे शासन किया

संकलन —: इतिहास के झरोखे से


संकलन —: मनीष पांचाल करनाल हरियाणा

स्वामी भीष्म जी महाराज की गणना आ​धुनिक भारत के निर्माताओं में की जाती है इस महान सन्यासी ने राष्ट्रीय पुनरूत्थान, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिणक पुर्नजागरण में योगदान दिया है स्वामी भीष्म जी ने अपने जीवन काल में 250 पुस्तकें लिखी और 85 क्रान्तिकारी आर्य भजनोपदेशक शिष्य तैयार किये जो आज भी वैदिक धर्म का प्रचार व सामाजिक समस्याओं के उन्मूलन के क्षेत्र में काम करके देश की सेवा कर रहे है स्वामी भीष्म जी ने लगभग 17 बार विभिन्न स्थानों पर शास्त्रार्थ करके सिद्ध किया कि सभी विश्वकर्मा वंशी शुद्ध और श्रेष्ठ पांचाल ब्राह्मण हैं। इस विषय पर स्वामी जी ने पांचाल ब्राह्मण प्रकाश-1932, पांचाल ब्राह्मण दीपिका, शिल्पी ब्राह्मण, पांचाल परिचय, महऋषि विश्वकर्मा, विश्वकर्मा दर्शन भाग एक व् भाग दो तथा पांचाल ब्राह्मण गोत्रवली आदि पुस्तकें लिख कर समाज को जगाने का काम किया।

स्वामी भीष्म आश्रम करैहडा, गाजियाबाद में स्वतन्त्रता के महानायक पं0 चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, अशफाक उल्ला खॉ, लाल बहादुर शास्त्री, रामचन्द्र विकल आदि अनेक बार स्वामी जी सहायता प्राप्त कर योजनाऐं बनाते थे अंग्रेज सरकार के तिरंगा झण्डा लगाने के प्रतिबन्ध के बावजूद भीष्म भवन घरौदा हरियाणा पर बडी शान से लहराता स्वामी जी ने जनमानस में राष्ट्रीयता की भावना को भरने में अपने सम्पूर्ण जीवन को समर्पित कर दिया प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री एवं श्रीमती इन्दिरा गांधी जी ने अपने अपने निवास स्थान पर स्वामी जी का अभिनन्दन व सत्कार किया और देश के प्रति की गयी उनकी सेवाओं के लिए आभार व्यक्त किया इनके त्याग सर्मपण युक्त पुरूषार्थ की गााधा देश प्रेमियों को सदैव प्रेरणा देती रहेगी।

संकलन —: मनीष पांचाल करनाल हरियाणा

 


रचियता पूज्यनीय श्री स्वामी भीष्म जी महाराज

 बग़ावत

शासक – शासित ,  शोषक – शोषित में रहता संघर्ष रात  दिन
बिन क्रांति की आग लगे ये मिटने की तकरार नही
इसलिए बग़ावत चाहता हूँ यह न्याय मुझे स्वीकार नहीं .
पूंजीपति ने निर्धन की कर्जे में झोपडी कब्ज़ा ली
परिवार पड़ा मैदान में है जुल्मो का पारावार नही
                                                                इसलिए बग़ावत …..1
पूंजीपति के महलों में भरे बक्स रेशमी कपड़ो के
मजदूर के तन पर देखा उधर साबूत  सूत का तार नही
                                                               इसलिए बग़ावत ….. 2
राम कृष्ण का लेकर नाम मन्दिर में माल उड़ाते हैं
कंगाल खड़ा दरवाज़े पर क्या चाहिए पूछा एक बार नहीँ
                                                               इसलिए बग़ावत …..3
जिसने हल की शक्ल नहीं देखी हक़दार हजारो बीघे का
जो हल पर हस्ती मिटा रहा एक बीघे का भी हकदार नही
                                                              इसलिए बग़ावत …..4
पुरे एकड़ में कोठी बनी जिसमे रहते हैं दो प्राणी
दस हाथ का घर दस रहते हैं सो सकते पैर पसार नही
                                                             इसलिए बग़ावत …..5
एक मोटे पन से परेशान एक है हड्डियों का ढांचा
परिवार तीन दिन का भूखा क्योंकि लगा कहीं रोजगार नही
                                                            इसलिए बग़ावत …..6
आकाश की छत के नीचे उधर मजदूर सड़क पर पड़ा हुआ
कमरे में  सेठ की  कार खडी  सो सकता वो बीमार नही
                                                           इसलिए बग़ावत …..7
एक ज्यादा खाकर मरता है एक भूखा ही प्राण गंवाता है
दो बच्चे पत्नी को छोड़ गया जिनका कोई आधार नही
                                                          इसलिए बग़ावत …..8
ये फल है इनके कर्मो का पाखंडी हमें बहकाते हैं
है राज व्यवस्था नष्ट – भ्रष्ट ईश्वर का अत्याचार नही
                                                         इसलिए बग़ावत …..9
चलनी हैं गोलियां बम बरसें खिल जाएँगी खून की होली यहाँ
कहैं भीष्म बिन किये बग़ावत  उतरे देश का भर नही

                                               रचियता पूज्यनीय श्री स्वामी भीष्म जी महाराज


 

💐लड्डू गोपाल की एक लीला💐                                     संकलन—:काव्या सिंह पांचाल

एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी । जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिबए भागने लगे । भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्हार के पास पहुँचे । कुम्हार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था । लेकिन जैसे ही कुम्हार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ । कुम्हार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं । तब प्रभु ने कुम्हार से कहा कि ‘प्रजापत जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है । मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है । भैया, मुझे कहीं छुपा लो ।’ तब कुम्हार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया । कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्हार से पूछने लगी – ‘क्यूँ रे, प्रजापत ! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या ?’ कुम्हार ने कह दिया – ‘नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा ।’ श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे । मैया तो वहाँ से चली गयीं । अब प्रभु श्री कृष्ण प्रजापत से कहते हैं – ‘प्रजापत जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो ।’कुम्हार बोला – ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।’भगवान मुस्कुराये और कहा – ‘ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ । अब तो मुझे बाहर निकाल दो ।’कुम्हार कहने लगा – ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा ।’प्रभु जी कहते हैं – ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ । अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।’अब कुम्हार कहता है – ‘बस, प्रभु जी ! एक विनती और है । उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।’भगवान बोले – ‘वो भी बता दो , क्या कहना चाहते हो ?’ कुम्भार कहने लगा – ‘प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है । मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।’भगवान ने कुम्हार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया ।’प्रभु बोले – ‘अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।’ तब कुम्हार कहता है – ‘अभी नहीं, भगवन ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है । उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है – जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे । बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।’ कुम्हार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्हार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया । फिर कुम्हार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया । उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया । प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया ।  प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये । जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़ेगोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठका अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे । लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर । कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते।

संकलन—:काव्या सिंह पांचाल


संकलन —: ऋतु पांचाल, पलवल

ख्वाहिश नहीं मुझे, मशहूर होने की,
आप मुझे पहचानते हो, बस इतना ही काफी है.
अच्छे ने अच्छा और, बुरे ने बुरा जाना मुझे
क्यों की जिसकी जितनी जरूरत थी
उसने उतना ही पहचाना मुझे.

जिन्दगी का फलसफा भी,कितना अजीब है,
शामें कटती नहीं और,साल गुजरते चले जा रहें है
एक अजीब सी, दौड है ये जिन्दगी
जीत जाओ तो कई, अपने पीछे छूट जाते हैं और
हार जाओ तो, अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं.

बैठ जाता हूँ, मिट्टी पे अकसर
क्योंकी मुझे अपनी, औकात अच्छी लगती है.
मैंने समंदर से, सीखा है जीने का सलीका,
चुपचाप से बहना और, अपनी मौज मे रहना.

ऐसा नहीं की मुझमें, कोई ऐब नहीं है,
पर सच कहता हूँ, मुझमें कोई फरेब नहीं है._
जल जाते है मेरे अंदाज से, मेरे दुश्मन,
क्यों की एक मुद्दत से मैंने न मोहब्बत
बदली और न दोस्त बदले हैं.

एक घडी खरीदकर, हाथ मे क्या बांध ली
वक्त पीछे ही, पड गया मेरे.
सोचा था घर बना कर, बैठुंगा सुकून से,
पर घर की जरूरतों ने, मुसाफिर बना डाला मुझे.

सुकून की बात मत कर, ऐ गालिब,
बचपन वाला इतवार, अब नहीं आता.
जीवन की भाग दौड मे, क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?
हँसती-खेलती जिन्दगी भी, आम हो जाती है.

एक सवेरा था, जब हँसकर उठते थे हम,
और आज कई बार बिना मुस्कुराये, ही शाम हो जाती है.
कितने दूर निकल गए, रिश्तों को निभाते निभाते
खुद को खो दिया हम ने, अपनों को पाते पाते.

लोग केहते है, हम मुस्कुराते बहुत है,
और हम थक गए, दर्द छुपाते छुपाते.
खुश हूँ और सबको, खुश रखता हूँ,
लापरवाह हूँ फिर भी, सब की परवाह करता हूँ.

मालूम है, कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी
कुछ अनमोल लोगों से, रिश्ता रखता हूँ.

संकलन —: ऋतु पांचाल, पलवल


सुबह सुबह वॉटस्प खोलो तो, यूँ लगता है हरिद्वार आ गए हैं
इतना ज्ञान बरसता है कि, मन एकदम शुद्ध हो जाता है
वॉटस्प के सभी ऋषि मुनियों को
मेरा प्रणाम…आपका
चमन विश्वकर्मा

Attitude तो मेरे पास भी है, लेकिन इतना फोकट का भी नहीं हैं,
जो बात-बात पे Attitude दिखाऊ.—:आदित्य विश्वकर्मा
I loved a GIRL & nd she broke my heart …..Now every piece of my heart love different girls …. people called it flirt that’s not fair ….. -: Naveen Panchal Delhi